Home ब्यूरोक्रेट्स चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्र पहले भी रहे हैं चर्चा में ….कई बड़े...

चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्र पहले भी रहे हैं चर्चा में ….कई बड़े फैसलों की वजह से रहे थे सुर्खियों में

453
0
SHARE

नयी दिल्ली 12 दिसंबर 2018। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने शुक्रवार को संवाददाता सम्मेलन बुलाकर हड़कंप मचा दिया है. सुप्रीम कोर्ट के जज अमूमन मीडिया से बात नहीं करते हैं. सुप्रीम कोर्ट के नंबर दो जस्टिस जे चेलमेश्वर के अलावा इस प्रेस कांफ्रेंस में जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ शामिल हुए. चारों जस्टिस का इशारा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र की तरफ़ था. ये पहली बार नहीं है जब दीपक मिश्र चर्चा में हैं.

इससे पहले, पिछले दिनों लखनऊ मेडिकल कॉलेज की मान्यता को लेकर भी विवाद हुआ था, जिसमें प्रशांत भूषण दीपक मिश्र की अदालत से निकल गए थे, हालांकि उन पर अवमानना का मामला नहीं बना था.

कई आदेशों को लेकर चर्चा में रहे

जस्टिस दीपक मिश्र कई आदेशों को लेकर चर्चा में रहे. इनमें से कुछ फ़ैसले उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रहते हुए सुनाए तो कुछ सुप्रीम कोर्ट में जज रहते हुए.

उनके चर्चित फ़ैसलों में दिल्ली के निर्भया गैंगरेप के दोषियों की फांसी की सज़ा बरकरार रखना और चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी वाली वेबसाइटों को बैन करना शामिल है.

केरल के सबरीमाला मंदिर के द्वार महिला श्रद्धालुओं के लिए खोलने के आदेश भी जस्टिस मिश्र ने ही दिए थे.

एक नज़र उन पांच चर्चित आदेशों पर, जिनमें जस्टिस मिश्र शामिल रहे.

1. सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान अनिवार्य

30 नवंबर, 2016 को जस्टिस दीपक मिश्र की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ही यह आदेश दिया था कि पूरे देश में सिनेमा घरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलाया जाए और इस दौरान सिनेमा हॉल में मौजूद तमाम लोग खड़े होंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 9 जनवरी, 2018 को एक अहम फ़ैसले में सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता खत्म कर दी है.

2एफ़आईआर की कॉपी 24 घंटों में वेबसाइट पर डालने के आदेश

7 सितंबर, 2016 को जस्टिस दीपक मिश्र और जस्टिस सी नगाप्पन की बेंच ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि एफ़आईआर की कॉपी 24 घंटों के अंदर अपनी वेबसाइट पर अपलोड करें.

इससे पहले जब जस्टिस मिश्र ने दिल्ली के चीफ़ जस्टिस थे, 6 दिसंबर, 2010 को उन्होंने दिल्ली पुलिस को भी ऐसे ही आदेश दिए थे, ताकि लोगों को बेवजह चक्कर न काटना पड़े.

3. आपराधिक मानहानि की संवैधानिकता बरकरार

13 मई, 2016 को सुप्रीम कोर्ट की जिस बेंच ने आपराधिक मानहानि के प्रावधानों की संवैधानिकता को बरकरार रखने का आदेश सुनाया, उसमें जस्टिस मिश्र भी शामिल थे.

यह फ़ैसला सुब्रमण्यन स्वामी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल व अन्य बनाम यूनियन के केस में सुनाया गया था. बेंच ने स्पष्ट किया था कि अभिव्यक्ति का अधिकार असीमित नहीं है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here